आजादी
कौन कहता हैं कि अब गुलामी नहीं रही।
अब देश आजाद है, हम सब आजाद हैं।
देश की आधी आबादी तो आज भी गुलाम है।
गुलाम है वह अपनों की, उनकी ही इच्छाओं की।
पर हम सब आजाद हैं......
पिता के लिए पराया धन है वह ।
जिसे सहेज कर रखना है बस।
पति के लिए अर्जित धन है वह।
जिसे मनमाने ढंग से उपयोग करना है अब।
पर हम सब आजाद है.........
जड़ होकर रह गई है वह जिसमे कोई अभिलाषा नहीं।
जहाँ कोई आशा नहीं, वहाँ चेतना भी नहीं।
सदियों से सोई है, इस चिर निद्रा में वह।
तंद्रा तो टुटी है पर चेतना में अभी नहीं आई है वह।
पर हम सब आजद है.........
जिस संतती को उत्पन्न कर जननी कहलायी है वह
पर वह भी उसके महत्व को कहॉ समझ पाई है।
अब वह गुलाम हो गई है स्वयं के विचारों की।
जिसमें अपने लिए ही कोई जगह नहीं बना पाई है वह।
पिता, पति,पुत्र को सहेजा जिन्दगी भर पर स्वयं के लिए नहीं जी पाई है।
पर हम सब आजाद हैं.........
औरत बनकर रह गई है वह मानव भी नहीं बन पाई है।
मानवों को तो समानता का अधिकार है, औरतों को कहां।
पुरुषों के पीछे चलना सीख पाई है जो उसे सिखाया गया है
उससे अधिक नहीं सोच पाई है।
पर हम सब आजाद हैं...........
अब देश आजाद है, हम सब आजाद हैं।
देश की आधी आबादी तो आज भी गुलाम है।
गुलाम है वह अपनों की, उनकी ही इच्छाओं की।
पर हम सब आजाद हैं......
पिता के लिए पराया धन है वह ।
जिसे सहेज कर रखना है बस।
पति के लिए अर्जित धन है वह।
जिसे मनमाने ढंग से उपयोग करना है अब।
पर हम सब आजाद है.........
जड़ होकर रह गई है वह जिसमे कोई अभिलाषा नहीं।
जहाँ कोई आशा नहीं, वहाँ चेतना भी नहीं।
सदियों से सोई है, इस चिर निद्रा में वह।
तंद्रा तो टुटी है पर चेतना में अभी नहीं आई है वह।
पर हम सब आजद है.........
जिस संतती को उत्पन्न कर जननी कहलायी है वह
पर वह भी उसके महत्व को कहॉ समझ पाई है।
अब वह गुलाम हो गई है स्वयं के विचारों की।
जिसमें अपने लिए ही कोई जगह नहीं बना पाई है वह।
पिता, पति,पुत्र को सहेजा जिन्दगी भर पर स्वयं के लिए नहीं जी पाई है।
पर हम सब आजाद हैं.........
औरत बनकर रह गई है वह मानव भी नहीं बन पाई है।
मानवों को तो समानता का अधिकार है, औरतों को कहां।
पुरुषों के पीछे चलना सीख पाई है जो उसे सिखाया गया है
उससे अधिक नहीं सोच पाई है।
पर हम सब आजाद हैं...........
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